बुधवार, 12 नवंबर 2014

द्रव बनूँ या द्रव्य

द्रव बनूँ या द्रव्य इसी उहापोह में जीवन के कई हज़ार लम्हे गुजार दिए ।

जब द्रव बना तो द्रव्य ने  मृग मरीचिका का रूप ले लिया, जैसे ही द्रव्य पास आया , मरीचिका तृष्णा में बदल गई , लेकिन मृग मृग ही रहा । कई देवउठनी एकादशियों को खीर खाई  कि आज तो शाप की अवधि ख़त्म हो परन्तु कालिदास और ईश्वर में यही तो अंतर है ।

उनकी कृति की शापावधि देवोत्थान एकादशी को ख़त्म हो जाती है, ईश्वर के बनाये की शापावधि कब ख़त्म होगी यह सिर्फ ईश्वर जानते हैं ।

हर दिन एक इम्तिहान सा लगता है , पिछले इम्तिहान से कहीं दुरूह , कहीं दुर्दांत , और हर दिन लगता है आज ख़त्म क्यों नहीं होता ?
 
  तारीख ने अहदों के वे जब्र भी देखे हैं अख्तर
  लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई


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