झूठ
मैंने कई बार , कई दिन, कई शामों को तुमसे सच कहना चाहा, लेकिन हर बार ऐसा लगा कि झूठ बोलने से तुम्हारा रेशम मेरे हाथ से फिसल जाएगा, और इसी लिए मैंने हर बार अपने को सच कहने से रोक लिया । हर बार मुझे लगता की अब तो सच बोल ही देना चाहिए , लेकिन हर बार मेरे बोले हुए झूठ पर तुम्हारा हुलसना मुझे शादाब कर गया, और मैं एक और झूठ बोलने की ओर बढ़ चला ।
यदि मेरे झूठ बोलने से तुम हुलसते हो, तुम्हारे अंदर का बचपन बना रहता है, तो मैं हर बार 'नरो वा कुंजरो वा' तैयार हूँ - मेरे प्रतिबिम्ब


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