रविवार, 2 अक्टूबर 2022

भय

किसका भय कैसा भय

जिसको जाना उसका भय
जिससे मिलना उसका भय

जिसके तेवर उसका भय
जिसका आदर उसका भय

जिसकी चाहत उसका भय
जिससे नफ़रत उसका भय

जिसकी इबादत उसका भय
जिससे अदावत उसका भय

जिससे वादा उसका भय
जिसका इरादा उसका भय

सच , भय के कितने रंग हैं



रविवार, 8 मई 2022

तुम

बंद होठों से कुछ न कह कर आंखों से कह जाते हो
जब भी आते हो हमको हमीं से चुरा कर ले जाते हो 

तुम जब भी झोंके सी घर में घूम जाती हो
तुम्हारी संदली बयार में मन झूम जाता है

कल तुम्हारे घर गया था, अम्मा को कुछ मेवे मँगाने थे
हमें मेवों से क्या मतलब, हमें तो बस तुम्हारे तेवर चुराने थे
 
पता है कल हम चोर बन गए , यूं इश्क़ में आशिक तुम्हारे घनघोर बन गए
तुम्हारे दुपट्टे का जो इक धागा चुराया था, हमारे लिए तो वो बिरहमन का सरमाया था
यूं रात भर उस पर पहरा दिया, मानो सिकंदर का खज़ाना
 जीत लाया था 

आज पूरे गांव का मौसम गुलाबी है , सब को रब से मिलने की बेताबी है
तुमने दुपट्टे की गांठ खोल दी है शायद, जिन्नातों को संदल के घर जाने की शिताबी है 

तुम न वो नीला जोड़ा मत पहना करो 
हमारे हिस्से का वक्त जम जाता है
और वो तुम्हारी पेशानी पर झमकता टीका
लिल्लाह उजाले में उजाला

तुमने जरूर वो पीर बाबा से मंतर लिया है
हमारी रूह को कैद रखने का जंतर लिया है 
वरना ये कैसे हो सकता है कि
नाज़ नजर से नजर सनम को नज़र ने मिलते नजर को देखा
नजर जो झुक के मिली नजर से नजर ने उठते नजर को देख

शुक्रवार, 7 जून 2019

उधेड़बुन

काफ़ी उद्विग्न हूँ। ज़रा सी बात पर जरा का प्रभाव स्पष्ट हो चला है। रिश्ते तनते जा रहे हैं; यहाँ बियाबान बनता जा रहा है। मेरी हैसियत नहीं हो पा रही  , यूँ लगता है जैसे रीढ़ की हड्डी टूट गई है, और जब भी उसे सीधा करने का प्रयास करो, वक़्त पीठ पर पैर रख उसे और भी कचका देता है। न ज्ञान बढ़ रहा है, न धन, बढ़ कुछ रही है तो उद्विग्नता। कैसी है यह विवशता, न माँ को सुख दे सका, न पत्नी सुखी हो सकी, न बेटे को कभी सुख के मायने समझा सका। जी चाहता है किसी दिन बल्कि अब तो हर दिन लगता है कहीं देह त्याग दूँ, लेकिन बेटे को देख ठहर जाता हूँ। पंडित कहते हैं कि शनि की साढ़ेसाती चल रही है, लेकिन, ये जो हर दिन चौंक कर 2:30 बजे उठ जाता हूँ, और फिर बिस्तर पर उलट-पलट करते 5 बजने का इंतज़ार करता हूँ, इन ढाई घंटों की यातना अब असहनीय सी लगने लगी है। बस रिश्तों के बारे में सोच उनके लिए कुछ नहीं कर पाने का अफ़सोस, मुझे हर पल छीजता जा रहा है। एक अजीब सा डर घर कर गया है, उजाले का डर, हर पल लगता है कोई दिल में ड्रिल कर रहा है, और मैं प्यार का पंचनामा के संवाद "तुम नकारा हो, नपुंसक हो" की आवृत्ति के दलदल में धंस चुका हूँ। वो अज्ञात सा डर हर खटके पर लगा रहता है, पता नहीं कब क्या

शनिवार, 1 जून 2019

सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग मानव को बीमार बना रहा है 


संदीप अपनी कुर्सी पर बैठ आज बड़ा खुश महसूस कर रहा था , और क्यों न हो, आज उसके फिजियोथेरेपी क्लिनिक का पहला दिन जो था ; उसकी इतने वर्षों की मेहनत आज रंग लाई  थी | घडी में जैसे ही ११ बजे, उसके क्लिनिक के बाहर एक कार रुकी, और उसमें से एक अधेड़ पुरुष निकल क्लिनिक में आए | संदीप ने उनका अभिवादन किया और पूछा "बताइए , मैं आपकी क्या मदद कर सकता हूँ?" | मरीज ने कहा "डॉ साहब, मेरे दाहिने हाथ की पाँचों उँगलियों में काफी दर्द रहता है, इसका कोई इलाज़ बताइए " | संदीप ने पूछा  "आप काम क्या करते हैं?" | मरीज ने कहा " जी, मेरा काफी बड़ा कारोबार है, और मैं दिन में १५-१६ घंटे मोबाइल पर ही बिताता हूँ, चाहे वो फेसबुक हो, इंस्टाग्राम हो, या ट्विटर हो" | संदीप के दिमाग में तुरनत एक बात कौंधी और उसने कहा " सर, आपको कार्पल टनल सिंड्रोम नाम की बीमारी है , जिसमें कार्पल टनल के अंदर की मीडियन नर्व के आसपास के सीनोवियम टेंडन्स के सूज जाने से मीडियन नर्व पर काफी सारा जोर पड़ रहा है , और आपको काफी दर्द हो रहा है | यह आपके  बहुत अधिक टाइपिंग  से हो रहा है | " मरीज ने कहा "लेकिन, डॉक्टर साहब, मैं टाइपिंग छोड़ भी तो नहीं सकता |" संदीप ने कहा "आप ऐसा कीजिए , बोल कर टाइप कीजिए , और ५ दिन बाद फिर आइए "| 

मरीज के जाने के बाद संदीप सोचने लगा कि सोशल मीडिया का अत्यधिक इस्तेमाल आदमी को किन तरीकों से प्रभावित करता है ; और तभी उसे अपना कानपुर वाला दोस्त रमेश याद आ गया जिसे फोन की ऐसी लत लग गई थी कि कभी भी पॉकेट टटोलता रहता था मोबाइल के लिए | संदीप ने गूगल पर इस बारे में थोड़ा खोजा तो उसे पता चला कि यह सही में एक बीमारी है जिसे "फैंटम रिंगिंग सिंड्रोम" कहते हैं, जिसमे हमारे दिमाग को हमेशा लगता है की हमारा फोन हमारी जेब में है |iDisorder  के लेखक डॉ लैरी रोसेन के अनुसार, इस बीमारी से ग्रस्त 70 प्रतिशत लोगों को जेब में वर्चुअल वाइब्रेशन का अनुभव होता है ।

संदीप ने थोड़ा और सोचा तो उसे अपने छोटे मामा  याद आए जिन्हें हमेशा चिंता होती रहती थी कि वे अपने मोबाइल से अलग ना हो जाएँ |मेडिकल डिक्शनरी में उसे इस बीमारी के लिए "नोमोफोबिया" शब्द मिला | आज की तारीख में लोग भले ही इस पर हँसते हैं लेकिन यह बीमारी इतनी विकराल हो गई है कि न्यूपोर्ट बीच, कैलिफोर्निया में मॉर्निंगसाइड रिकवरी सेंटर में एक समर्पित नोमोफोबिया उपचार कार्यक्रम के लिए प्रेरित किया है।

संदीप को अपने इनबॉक्स में पड़ी एक ईमेल याद आई जिसमें "साइबरसिकनेस" बीमारी का जिक्र था जिसमें  कतिपय डिजिटल एन्वायरन्मेंट्स का दैनंदिन व्यवहार करने से कई लोगों को सामान्य जीवन में भटकाव एवं बिखराव महसूस होता है |  आईफोन पर प्रयोग होने वाली आईओएस के नए संस्करण को  जैसे ही कुछ महीनों पहले  आईफोन और आईपैड उपयोगकर्ताओं के लिए खोला गया, एप्पल  के  ग्राहक समर्थक फ़ोरमों पर नए इंटरफ़ेस का उपयोग करने के बाद लोगों को भटकाव और मिचली महसूस करने वाली शिकायतों की बाढ़ सी आ गई ।  बड़े पैमाने पर एप्पल के पैरेलेक्स इफ़ेक्ट के अत्यधिक आकर्षक उपयोग को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया गया है, जिससे आइकन और होमस्क्रीन डिस्प्ले ग्लास के नीचे त्रिआयामी संसार के भीतर तैरते नज़र आते  हैं ।

संदीप के छोटे भाई को ऑनलाइन गेम खेलना बहुत पसंद है, , सो संदीप ने इसके दुष्प्रभावों को खोज उनके बारे में पढ़ना शुरू किया | उसे एक आलेख मिला जिसमें लिखा था कि दक्षिण कोरियाई सरकार द्वारा कराए गए  एक अध्ययन के अनुसार, 9 और 39 वर्ष की आयु के बीच की लगभग8 प्रतिशत आबादी या तो इंटरनेट या ऑनलाइन गेमिंग की लत से पीड़ित है , इसलिए दक्षिण कोरिया  ने एक तथाकथित "सिंड्रेला कानून"  लागू किया है, जो 16 साल से कम उम्र के उपयोगकर्ताओं के लिए आधी रात और सुबह 6 बजे के बीच ऑनलाइन गेम तक पहुंच में कटौती करता है। कुछ ऐसा ही जुनून विश्व में पबजी गेम हेतु देखने मिल रहा है, जिससे त्रस्त  हो कर  विश्व ने इसको बनाने वाली कंपनी पर ऐसा दबाव बनाया कि कंपनी को १३ वर्ष से कम उम्र वालों के लिए लगातार गेम खेलने की अवधि को ६ घंटों  पर प्रतिबंधित करना पड़ा | 

संदीप को अपनी मौसी याद आईं जो हर दुसरे दिन एक बीमारी ले कर बैठ जाती थीं , की उन्हें यही बीमारी है क्योंकि उन्होंने इसके बारे में अभी अभी इंटरनेट पर पढ़ा है ; सो संदीप ने सोचा क्या यह मनोवैज्ञानिक बीमारी सब को होती है ; और उसे माइक्रोसॉफ्ट  का एक २००८ का पेपर मिला जिसमें  इसे "साइबरकॉन्ड्रिया" का नाम दिया गया है और उस पेपर के अनुसार  हम इंटरनेट पर काफ़ी सारी बीमारियों  के बारे में पढ़ते हैं , और कई बार इन बीमारियों के बारे में पढ़ते पढ़ते हमें यह विश्वास  हो जाता है कि यह बीमारी मुझे है, और फिर हम वहम के शिकार हो जाते हैं , जिसका इलाज तो हक़ीम लुक़मान के पास भी नहीं था | 

संदीप के पास तभी मधु का मैसेज आया कि वह आजकल काफी थका थका महसूस कर रही है इसलिए वह केवल मोबाइल के साथ समय बिताती है | संदीप ने एक मेडिकल फोरम पर ये लक्षण पोस्ट किये तो उसे पता चला कि मोबाइल को  चेहरे से नजदीक रखना मेलाटोनिन हॉर्मोन के स्राव को रोकता है जिससे हम हमेशा थका थका महसूस करते हैं  एक और बात संदीप को पता चली  कि स्क्रीन-टाइम हमारी आंखों के लिए बहुत निकट,स्थिर फोकल लंबाई बनाता है। आंख में सिलिअरी मांसपेशियों को आराम मिलता है जब दूर दृष्टि लगी होती है, और यह छोटी फोकल लंबाई में सिकुड़ती है। स्क्रीन पर घंटों तक टकटकी लगाना सिलिअरी मांसपेशी के निरंतर संकुचन को प्रभावित करता है एवं मायोपिया का एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है ।  

संदीप ने सोचा कि सोशल मीडिया के चलते इतने सारे लोग इतनी देर तक बैठे रहते हैं क्या उनपर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता? थोड़ा खंगालते ही उसे एक पेपर मिला जिसमे साफ़ साफ़ लिखा था कि ज्यादा देर तक बैठे रहना हमारे शरीर में प्राकृतिक रूप से होने वाले  इन्सुलिन एवं ग्लूकोस के स्राव को धीमा कर देता है जिससे कालांतर में डायबिटीज एवं कैंसर जैसी बीमारियाँ उभर कर सामने आती हैं | वैस्क्युलर एंडोथेलियल ग्रोथ फैक्टर नामक प्रोटीन का स्राव शरीर के जड़ हिस्सों में अपने आप कम हो जाता है और यह रिसाव जितना कम होता है , शरीर उतना ही कुपोषित होता चला जाता है | 

संदीप को अब गूगल और ईमेल  की महत्ता समझ में आ रही थी, उसने तभी सोचा कि सबसे बढ़िया सॉफ्टवेयर तो इसका मतलब इंस्टाग्राम ही है ,बस फोटो डालते रहो , लाइक करते रहो , सो उसने इंस्टाग्राम के बारे में थोड़ा पढ़ना चाहा और उसे पता चला कि प्रतिदिन इंस्टाग्राम पर ९.५  करोड़ फोटो शेयर किये जाते हैं, और इनसे उपजता है अवसाद, दूसरों की फोटो देख जन्मती हीन भावना एवं फिटस्पिरेशन तस्वीरों से जन्मता अपराध बोध हमें अवसाद के दुष्चक्र में डाल देता है और एनोरेक्सिया नर्वोसा जैसी कई बीमारियाँ हमें अपने चंगुल में जकड़ लेती हैं | 

 संदीप को तभी फेसबुक पर परमिंदर ने पिंग किया |परमिंदर अपने आप में संदीप की मित्रमडली का फेसबुक था , पूरे दिन फेसबुक फेसबुक और कुछ नहीं| संदीप ने उत्सुकतावश फेसबुक का अत्यधिक प्रयोग सर्च किया तो उसे पता चला कि  परमिंदर को "फेसबुक सिंड्रोम" है , जिसमें वो केवल फेसबुक के बारे में ही सोचता रहता है , और असंयमित हो जाता है यदि वो कुछ देर फेसबुक न करे | परमिंदर अक्सर कहता रहता था कि फेसबुक उसके लिए पढाई के तनाव को दूर करने का माध्यम है , और संदीप ने पढ़ा कि वस्तुतः यह फेसबुक सिंड्रोम का एक प्रमुख लक्षण है | 

 

संदीप कम्प्यूटर बंद कर ही रहा था कि उसके फ़िज़ियोथेरेपिस्ट ग्रुप के आज के बुलेटिन पर उसकी नजर पड़ी , जिसमे "टेक्स्ट नेक" नामक बीमारी का जिक्र था | संदीप ने जब उस मेल को पढ़ा तो उसे पता चला कि कंप्यूटर/मोबाइल पर लगातार झुके झुके गर्दन के प्राकृतिक झुकाव में ३६० डिग्री परिवर्तन आ जाता है जिससे स्पाइनल आर्थराइटिस की संभावना काफी बढ़ जाती है, फेफड़ों के शक्ति करीब ३०% घट जाती है, लगातार सरदर्द होता रहता है जो धीरे धीरे माइग्रेन का रूप ले लेता है और कई बार तो डिस्क तक  डिस्लोकेट हो जाती है  |  

 

संदीप ने  कंप्यूटर बंद किया , मोबाइल ऑफ किया और सोशल मीडिया के तमाम पहलुओं पर विचार करते हुए घर की ओर बढ़ चला |   

 

रविवार, 23 सितंबर 2018

एक कविता

मैं तुमसे प्यार करना चाहता हूँ
मैं तुमपे हर बार मरना चाहता हूँ

अमलतास की बेल धूप में जब कुम्हलाने लगे
नाई जब बार बार तुम्हारी दादी से मिलने आने लगे
छप्पर पर लगी लौकियों को जब बाँटने का मौसम आने लगे
धूप की तीखी तुर्शियां जब मूँछों में मुस्कुराने लगें

मैं तब भी तुमसे प्यार करना चाहता हूँ
मैं तब भी तुमपे हर बार मरना चाहता हूँ

जब तुम्हारे धानी दुपट्टे का रंग हवा में बिखर जाए
जब तुम्हारी आँखों के काज़ल से क़ायनात कुछ औऱ निखर जाए
जब तुम्हारी हँसी की खनक से पूरा घर संवर जाए
जब तुम्हारे गुस्से की धमक से भँवरे भी ठहर जाएं

मैं तब भी तुमसे प्यार करना चाहता हूँ
मैं तब भी तुमपे हर बार मरना चाहता हूँ

जब तुम्हारे गले मे डला मूँगा सूरज की किरणों से अठखेलियां करे
जब तुम्हारी वो फिरोज़ी नेलपॉलिश अग्रहायणी भोर से रंगरेलियां करे
जब तुम्हारी पायलों की आपसी जलन मुहल्ले का चलन बन जाए
जब तुम्हारी चूड़ियों का अवकलन मनिहारिन की टोकरी का व्यवकलन बन जाए

मैं तब भी तुमसे प्यार करना चाहता हूँ
मैं तब भी तुमपे हर बार मरना चाहता हूँ

मेरा गुस्सा

मैं आजकल सुबह नहीं होने देना चाहता, क्योंकि सुबह होगी , वही समाचारपत्र उसी काली स्याही में चीखेगा, एक और गैंगरेप या एक और बहन मुर्दे जैसी हालत में मिली, भाई उसके गहने बेच कर गायब, इसलिए रात ही अपने किसी भी रूप में दिन से बेहतर है; कम से कम ईमानदार तो है, दिन जैसे सपने तो नहीं दिखलाती, कोई आस तो नहीं जगाती, काली है काले लोगों को पनाह देती है, काले काम होते हैं, मायाविनी है।

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रविवार, 3 जून 2018

अब डिजाइनर इंसान

 डॉ उमेदा की घडी ने जैसे ही छह बजाए उनके होंठों पर दिन ख़त्म होने वाली मुस्कान फ़ैल गई वे अपना लैपटॉप बंद करतींतभी उनकी दोस्त सोनिया ने रोते-रोते उनके रूम में प्रवेश कियाडॉ उमेदा घबरा गईं लेकिन फिर खुद पर काबू पाते हुए उन्होंने सोनिया को पानी का गिलास ऑफर किया सोनिया पूरा पानी एक साँस में पी गई और फिर कहा "थैंक्स" उमेदा ने पूछा , "बात क्या है",, सोनिया ने जवाब दिया "बात मेरी नहींउमेश की हैउमेश को एक सम्पूर्ण संतान चाहिए " |उमेदा चौंक गईं और पूछा  "मतलब?" | सोनिया ने कहा "मेरे पति को  एक ऐसा बच्चा चाहिएजो हर प्रकार से अप्रतिम हो "उमेदा की समझ में बात धीऱे धीऱे आ रही थीलेकिन उन्होंने सोनिया को बस इतना कहा "तुम अभी जाओमैं इस बारे में थोड़ी जानकारी हासिल कर तुमसे बात करूँगी "
सोनिया के जाते ही  डॉ  ने अपने कंप्यूटर पर उँगलियाँ चलाईं और पहले ही पन्ने पर उन्हें मिली यह बात "दुनिया भर में आनुवंशिकीविद और विकास जीवविज्ञानी डिजाइनर शिशुओं को बनाने के लिए जीवाश्म लाइन इंजीनियरिंग का उपयोग करने के बारे में  बात कर रहे हैं जो संक्रमण के लिए मजबूतस्मार्ट या अधिक प्रतिरोधी होगा।"
डॉ के मन में एक सवाल कुलबुलाया कि ठीक है बच्चा संक्रमण के लिए अधिक प्रतिरोधी होगालेकिन अगर बीमार हो ही गया तोतभी उनकी नजर अगले पन्ने पर पड़ी जहाँ लिखा था " जेनेटिक इंजीनीयर दोषपूर्ण जीन को खत्म कर सकते हैं। असल मेंमानवता अपने विकास पर नियंत्रण रखेगीइसलिए ऐसी संभावना पर काम किया जा रहा है कि कोई बीमार करने वाला जीन हमारे शरीर में हो ही न"उसी पन्ने पर आगे लिखा हुआ था "CRISPR-CAS जीन संपादन का एक क्रांतिकारी रूप है जो प्रयोगशाला वैज्ञानिकों को सटीकता और दक्षता के साथ जीनोम संपादित करने की अनुमति देता है। इस तकनीक का उपयोग करकेप्रयोगशालाओं ने लक्षित उत्परिवर्तनों के साथ बंदरों को बनाया है और मानव कोशिकाओं में एचआईवी संक्रमण को रोका है। चीनी वैज्ञानिकों ने घोषणा की है कि उन्होंने आनुवांशिक बीमारी का इलाज करने की सीआरआईएसपीआर की क्षमता के प्रयास में अभावनीय मानव भ्रूण के लिए तकनीक लागू की है"|   
अब डॉ तो डॉ ठहरीं
उनके दिमाग में सवालों की आंधी तो रुकने का नाम ही न ले रही थी उनके दिमाग में सवाल उठा कि ठीक है बच्चा निरोग पैदा होगा और उसे कोई बीमारी नहीं होगीलेकिन ये कैसे सुनिश्चित होगा कि उसमें ताकत ज्यादा होगीउसकी रफ़्तार चीते सी होगी और वो काफी मजबूत होगा बस इन सारे सवालों को उन्होंने मेड-ग्रिड में डाल दियाऔर जबतक वो कॉफ़ी ले कर आतीं उनके सवालों का उत्तर मेड-ग्रिड ने दे दिया "
१) सुपर मांसपेशियों की ताकत:  हाइपरट्रॉफी एक ऐसी स्थिति है जहां एक जीन मायोस्टैटिन नामक प्रोटीन को अपना सामान्य काम करने से रोकता है जिससे मांसपेशी कोशिकाएं सामान्य से अधिक बड़ी और ज्यादा हो जाती हैं जिससे लोगों को उनके मांसपेशियों में वृद्धि मिलती है।
२) सुपर स्पीड: अल्फा-एक्टीनिन नामक प्रोटीन तेजी से जुड़ने वाली मांसपेशियों के फाइबर को नियंत्रित करता हैतेजी से टेंसिंग और स्पिंटिंग या वजन उठाने में शामिल मांसपेशियों के फ्लेक्सिंग के लिए ज़िम्मेदार कोशिकाएं। यदि जेनेटिक इंजीनियरिंग कर के अल्फा-एक्टीनिन का रिसाव तेज कर दिया जाए तो स्पीड अपने आप बढ़ जायेगी|   
३) सुपर हड्डी : LRP-नामक एक जीन का उत्परिवर्तन हड्डी कोशिकाओं पर कुछ सिग्नलिंग मार्ग पैदा कर सकता हैजिससे उन्हें घनत्व और घना हो जाता है - ऐसी स्थितियां जिन्हें आमतौर पर ऑस्टियोस्क्लेरोसिस और हाइपरोस्टोसिस कहा जाता है। इस स्थिति वाले कुछ लोगों में स्वास्थ्य समस्याएं नहीं होती हैंऔर घने हड्डियों का मतलब है कि वे अपनी हड्डियों को तोड़ने की चिंता नहीं कर सकते हैं।"

डॉ की मुस्कराहट जैसे जैसे बड़ी होती जा रही थीडॉ के दिमाग में उतने ही सवाल आ रहे थे अगला सवाल डॉ के दिमाग में नवजात शिशु की बौद्धिक क्षमता को ले कर उठा लेकिन उन्हें अपने मिशीगन यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर का वो आर्टिकल याद आया जिसमें उन्होंने पढ़ा था "
तेजी से आगे बढ़ने वाले आनुवंशिकी अनुसंधान के परिणामस्वरूप आज के सबसे शानदार विचारकों की तुलना में आईक्यू में एक हज़ार गुना अधिक सुपर बुद्धिमान इंसानों की क्षमता प्राप्त करने की ओर हम अग्रसर हैं | मिशिगन स्टेट यूनिवर्सिटी में सैद्धांतिक भौतिकी के शोध और प्रोफेसर के उपाध्यक्ष स्टीफन हू का मानना ​​है कि हम खुफिया नियंत्रण के लिए हजारों आनुवांशिक रूपों की पहचान करने से केवल एक दशक दूर हैं। इन प्रकारों कोजिन्हें एलील कहा जाता हैको जल्द ही गर्भवती बच्चे के माता-पिता और संभवतः आनुवांशिक इंजीनियरिंग के लिए उनकी बुद्धि पर चुना जा सकता है।"
डॉ के दिमाग में दो और सवाल आ रहे थेवे सोचने लगीं कि क्या ये अतिमानव कभी बूढ़े नहीं होंगे और इन सुपरह्यूमन्स की तो बात ठीक है पर क्या कैंसर जैसी सांघातिक बीमारी का भी कोई इलाज सम्भव है तभी उनकी नजर अपने इनबॉक्स में आये एक सन्देश पर पड़ी जिसका शीर्षक था, 'बुढ़ापा हमारा दुश्मन है' | बड़ी उत्सुकता से उन्होंने उसे खोला और पढ़ने लगीं "
जापान में शोधकर्ताओं ने पाया है कि मानव उम्र बढ़ने से मानव सेल लाइनों में कम से कम सबसे बुनियादी स्तर में देरी हो सकती है या यहां तक ​​कि उलट भी जा सकती है। इस प्रक्रिया मेंसुकुबा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने यह भी पाया कि दो जीनों का विनियमन हम कैसे उम्र से संबंधित है।
नए निष्कर्ष उम्र बढ़ने के मौजूदा लोकप्रिय सिद्धांतों में से एक को चुनौती देते हैंजो मनुष्यों की अपरिहार्य डाउनहिल स्लाइड के लिए जिम्मेदार है जो हमारे माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए में समय के साथ जमा होता है। माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए के नुकसान को डीएनए अनुक्रम में परिवर्तन या उत्परिवर्तन में परिणाम होता है जो वृद्धावस्थाओस्टियोपोरोसिस और निश्चित रूप से जीवन के समय से जुड़े होते हैं।
लेकिन सुकुबा शोधकर्ताओं का शोध इंगित करता है कि यह मुद्दा नहीं हो सकता है कि माइटोकॉन्ड्रियल डीएनए क्षतिग्रस्त हो सकता हैबल्कि यह कि जीन समय के साथ "बंद" या "चालू" हो जाते हैं। सबसे दिलचस्पप्रोफेसर जून-इची हायाशी की अगुआई वाली टीम कुछ जीनों पर स्विच को फ्लिप करने में सक्षम थीजो उम्र बढ़ने की प्रक्रिया को प्रभावी रूप से उलट देती थी।" | 
संयोग से उसके बाद वाली ईमेल का भी शीर्षक था , कैंसर को दें पटखनी | उसे खोलते ही डॉक्टर आश्वस्त हो गईं क्योंकि उसमे लिखा था "एक महत्वपूर्ण तकनीक डीएनए तरल बायोप्सी परीक्षण है: एक साधारण रक्त ड्रॉप के आधार पर कैंसर-स्क्रीनिंग परीक्षण। चूंकि मरने वाली कैंसर कोशिकाओं ने रोगी के खून में थोड़ी मात्रा में डीएनए डाला हैअतः इस प्रकार के परीक्षण से कैंसर का पता लगाना शुरू हो सकता है। चीन मेंशोध अस्पताल इन परीक्षणों का उपयोग करके बड़े अध्ययन कर रहे हैंयह साबित करने की कोशिश कर रहे हैं कि डीएनए विश्लेषण यकृत ट्यूमर और नासोफैरेनजीज कार्सिनोमा जैसी बीमारियों के लिए स्क्रीनिंग परीक्षण के रूप में कार्य कर सकता है। आशा है कि भविष्य मेंइमेजिंग और आक्रामक ऊतक बायोप्सी के बजायतरल बायोप्सी का उपयोग कैंसर उपचार के फैसलों और ट्यूमर के लिए स्क्रीन को मार्गदर्शन करने के लिए भी किया जा सकता है। बहुत विशिष्ट सबसेट के लिए तरल बायोप्सी परीक्षण यह कैंसर के निर्णय लेने में चिकित्सकों के लिए एक उपयोगी उपकरण साबित हो सकता हैजो शुरुआती लक्षण पेश करता है।"