रविवार, 23 सितंबर 2018

मेरा गुस्सा

मैं आजकल सुबह नहीं होने देना चाहता, क्योंकि सुबह होगी , वही समाचारपत्र उसी काली स्याही में चीखेगा, एक और गैंगरेप या एक और बहन मुर्दे जैसी हालत में मिली, भाई उसके गहने बेच कर गायब, इसलिए रात ही अपने किसी भी रूप में दिन से बेहतर है; कम से कम ईमानदार तो है, दिन जैसे सपने तो नहीं दिखलाती, कोई आस तो नहीं जगाती, काली है काले लोगों को पनाह देती है, काले काम होते हैं, मायाविनी है।

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