गुरुवार, 27 नवंबर 2014

अलसाई सुबह

नवम्बर के अंतिम दिन । सुबह की हलकी ठंड और धूप के रेशों का धीरे धीरे फैलना लिल्लाह ऐसा नज़ारा बस जम जाए और हम इस पर फिसलते रहें ।

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बुधवार, 26 नवंबर 2014

परिणति

प्रणय को परिणय का रूप धरते हुए इधर कई जगहों पर देखा है ।
काफी अच्छा लगा था आरम्भ में कि चलो 4 घंटे का साथ 24 का हो रहा है, लेकिन, जैसे जैसे हाथों की मेहँदी सूख रही है, प्रेम किसी कोने में पड़ा दीख रहा है।
कई मामलों में प्रेम अक्षुण्ण है परंतु जब बात परिवार को साथ ले कर चलने की होती है , जनता तुरंत अपने सामंजस्य को ले चढ़ बैठती है ;और हर कोशिश करती है कि परिवार का गला घोंट पत्नी की इश्माइल बरक़रार रहे ।
जय हो प्रेमी युगल, मिल्को बाथो सनो फ्रूटो

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मंगलवार, 18 नवंबर 2014

झूठ



मैंने कई बार , कई दिन, कई शामों को तुमसे सच कहना चाहा, लेकिन हर बार ऐसा लगा कि झूठ बोलने से तुम्हारा रेशम मेरे हाथ से फिसल जाएगा, और इसी लिए मैंने हर बार अपने को सच कहने से रोक लिया । हर बार मुझे लगता की अब तो सच बोल ही देना चाहिए , लेकिन हर बार मेरे बोले हुए झूठ पर तुम्हारा हुलसना मुझे शादाब कर गया, और मैं एक और झूठ बोलने की ओर बढ़ चला ।

यदि मेरे झूठ बोलने से तुम हुलसते हो, तुम्हारे अंदर का बचपन बना रहता है, तो मैं हर बार 'नरो वा कुंजरो वा'  तैयार हूँ - मेरे प्रतिबिम्ब 

बुधवार, 12 नवंबर 2014

द्रव बनूँ या द्रव्य

द्रव बनूँ या द्रव्य इसी उहापोह में जीवन के कई हज़ार लम्हे गुजार दिए ।

जब द्रव बना तो द्रव्य ने  मृग मरीचिका का रूप ले लिया, जैसे ही द्रव्य पास आया , मरीचिका तृष्णा में बदल गई , लेकिन मृग मृग ही रहा । कई देवउठनी एकादशियों को खीर खाई  कि आज तो शाप की अवधि ख़त्म हो परन्तु कालिदास और ईश्वर में यही तो अंतर है ।

उनकी कृति की शापावधि देवोत्थान एकादशी को ख़त्म हो जाती है, ईश्वर के बनाये की शापावधि कब ख़त्म होगी यह सिर्फ ईश्वर जानते हैं ।

हर दिन एक इम्तिहान सा लगता है , पिछले इम्तिहान से कहीं दुरूह , कहीं दुर्दांत , और हर दिन लगता है आज ख़त्म क्यों नहीं होता ?
 
  तारीख ने अहदों के वे जब्र भी देखे हैं अख्तर
  लम्हों ने खता की थी सदियों ने सजा पाई